- बच्चों की ज्यादातर समस्याएँ उम्र के साथ ठीक हो जाती हैं। आमतौर पर सलाह होती है — निश्चिंत रहें और तय समय पर दिखाएँ।
- दो बातें इंतजार नहीं कर सकतीं। अंडकोष न उतरा हो तो 12 से 18 महीने तक ऑपरेशन। अंडकोष में अचानक दर्द उसी घंटे की इमरजेंसी है।
- बच्चे की चमड़ी जबरदस्ती पीछे न करें। जबरदस्ती से वही टाइटपन बनता है जिससे बचना है।
अंडकोष में अचानक दर्द, खासकर जो बच्चे को नींद से जगा दे — उसी घंटे दिखाएँ; मरोड़ में लगभग छह घंटे होते हैं। इनमें भी तुरंत जाएँ — शिशु को बिना साफ कारण बुखार, बच्चे का पेशाब न कर पाना, या नवजात लड़के की धार का सिर्फ बूँद-बूँद आना।
बिस्तर गीला करना
छोटी उम्र में यह सामान्य है। न शरारत है, न बच्चे की गलती। डाँटने से बिगड़ता है और देर लगती है।
- 5 साल तक — सामान्य। न जाँच, न इलाज।
- 5 से 7 साल — आम बात। भरोसा दिलाना और आसान उपाय काफी हैं।
- 7 साल के बाद — दिखाना चाहिए, खासकर अगर लगभग हर रात हो।
- किसी भी उम्र में — दिन में भी कपड़े गीले हों, बच्चा छह महीने सूखा रहकर दोबारा शुरू करे, पेशाब में जोर लगे या धार कमजोर हो, बार-बार इन्फेक्शन हो, या बहुत प्यास लगे और पेशाब बहुत ज्यादा हो — तो दिखाएँ।
जाँच यूरिन टेस्ट, डायरी और कब्ज देखने से शुरू होती है — भरी आँत मूत्राशय पर दबाव डालती है और यही सबसे ज्यादा छूटने वाली वजह है। इलाज पानी का समय तय करने, टॉयलेट की दिनचर्या बनाने और कब्ज ठीक करने से शुरू होता है। लगन वाले बच्चे और परिवार में अलार्म सबसे असरदार लंबा उपाय है। डेस्मोप्रेसिन स्कूल ट्रिप जैसी छोटी जरूरतों में काम आती है। माता-पिता के लिए पूरी जानकारी →
अंडकोष का न उतरना — समय मायने रखता है
जन्म के समय एक या दोनों अंडकोष नीचे नहीं आए हो सकते। बहुत से पहले तीन से छह महीनों में अपने आप उतर जाते हैं। उसके बाद संभावना कम होती है, और यहीं से समय अहम हो जाता है।
- ऑपरेशन लगभग 12 से 18 महीने की उम्र तक हो जाना चाहिए।
- बाहर रह गया अंडकोष ज्यादा तापमान झेलता है, जिसका असर आगे शुक्राणु बनने पर पड़ता है।
- कैंसर का खतरा जीवन भर ज्यादा रहता है, और ऑपरेशन के बाद भी कुछ ज्यादा बना रहता है — इसीलिए अंडकोष को वहाँ लाया जाता है जहाँ उसकी जाँच हो सके।
- रिट्रैक्टाइल अंडकोष, जो हाथ से नीचे आ जाए और थोड़ी देर रुके, सामान्य है। उसमें निगरानी चाहिए, ऑपरेशन नहीं। फर्क जाँच से पता चलता है।
- नवजात में दोनों अंडकोष न मिलें तो अभी जाँच चाहिए, अगली मुलाकात पर नहीं।
चमड़ी से जुड़े सवाल
माता-पिता के आने का सबसे आम कारण, और आमतौर पर कुछ करने की जरूरत नहीं होती।
- शिशु और छोटे बच्चों में चमड़ी का पीछे न होना सामान्य है। वह सालों में अलग होती है। ज्यादातर लड़के किशोरावस्था तक कर पाते हैं।
- जबरदस्ती कभी न करें। जबरदस्ती से त्वचा फटती है और निशान छोड़कर भरती है। वही निशान बाद में ऑपरेशन माँगता है।
- चमड़ी के नीचे सफेद कण झड़ी हुई त्वचा है, मवाद नहीं।
- पेशाब करते समय फूलना आम है और आमतौर पर ठीक हो जाता है। धार कमजोर हो या इन्फेक्शन हो तो दिखाएँ।
- बार-बार सूजन, सफेद निशान वाला छल्ला, पेशाब में दर्द, या इन्फेक्शन होने पर आएँ।
बच्चों में यूरिन इन्फेक्शन
बड़ों से अलग तरीके से देखा जाता है, क्योंकि यह बनावट की किसी गड़बड़ी का पहला संकेत हो सकता है। शिशुओं में लक्षण साफ नहीं होते — बिना कारण बुखार, दूध कम पीना, चिड़चिड़ापन, उल्टी, या वजन न बढ़ना।
- दवा शुरू करने से पहले सही तरीके से लिया गया सैंपल जरूरी है। थैली वाला सैंपल आसानी से दूषित हो जाता है और अक्सर दोबारा लेना पड़ता है।
- पुष्टि होने पर गुर्दों और मूत्राशय का अल्ट्रासाउंड कराया जाता है।
- रिफ्लक्स — पेशाब का उल्टा गुर्दे की ओर जाना — बार-बार इन्फेक्शन या असामान्य स्कैन पर देखा जाता है। हल्के दर्जे के कई मामले बच्चे के बढ़ने के साथ ठीक हो जाते हैं। इसे पहचानने का मकसद तब तक गुर्दे को बचाना है।
- कब्ज और पेशाब रोकने की आदत बहुत आम वजहें हैं। इन्हें ठीक करने से बार-बार एंटीबायोटिक देने के मुकाबले ज्यादा फायदा होता है।
ज्यादातर मुलाकातें भरोसा दिलाने और अगली तारीख के साथ खत्म होती हैं। जहाँ समय मायने रखता है, वहाँ बात महीनों की होती है — सालों की नहीं।
और किन बातों पर आएँ
- हाइपोस्पेडियास — पेशाब का छेद सिरे पर नहीं, नीचे की तरफ। शिशु अवस्था में जाँच कराएँ। पहले खतना न कराएँ — मरम्मत में चमड़ी की जरूरत पड़ सकती है।
- शिशु में हाइड्रोसील — आम, और आमतौर पर पहले साल में चली जाती है। इसके बाद भी रहे, या दिन भर में आकार बदले, तो दिखाएँ।
- गर्भावस्था के स्कैन में गुर्दे की सूजन — ज्यादातर ठीक हो जाती है, पर जन्म के बाद स्कैन और फॉलो-अप की योजना बनती है।
- लड़के में धार कमजोर होना — यह हमेशा महत्वपूर्ण है। इसमें जाँच होती है, इंतजार नहीं।
- पहले सूखे रहने वाले बच्चे में दिन में गीला करना या पेशाब रोकने की कोशिश।
क्या साथ लाएँ
- टीकाकरण और ग्रोथ रिकॉर्ड।
- गर्भावस्था के ऐसे स्कैन जिनमें गुर्दों का जिक्र हो।
- सभी यूरिन रिपोर्ट और कल्चर, और दी गई दवाएँ।
- अल्ट्रासाउंड या दूसरे स्कैन की रिपोर्ट।
- बिस्तर गीला करने में — दो हफ्ते का सूखी और गीली रातों का रिकॉर्ड, और पेट साफ होने की आदत।
- परिवार में किसी और को बचपन में यही समस्या रही हो तो बताएँ — ये दोनों समस्याएँ परिवारों में चलती हैं।
यह पेज केवल सामान्य जानकारी देता है। यह चिकित्सा सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। अपनी स्थिति के अनुसार जाँच और सलाह के लिए योग्य यूरोलॉजिस्ट से मिलें।
